आईआईटी कानपुर के शोधकर्ताओं ने बाहरी अंतरिक्ष में 70 साल पुरानी प्लाज्मा रिलैक्सेशन समस्या के समाधान का सूत्र दिया

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कानपुर, 12 मई, ।  भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर के शोधकर्ताओं की एक टीम ने टर्बुलेंट रीलैक्सैशन के लिए एक सार्वभौमिक तंत्र का प्रस्ताव दिया है, जिसे प्लाज़्मा और जटिल तरल पदार्थों सहित तरल पदार्थों की एक विस्तृत श्रृंखला पर लागू किया जा सकता है। यह सिद्धांत, वैनिशिंग नॉनलाइनियर ट्रांसफर (पीवीएनएलटी) के सूत्र के रूप में जाना जाता है, यह बताता है कि ड्राइविंग फोर्स बंद होने पर एक टर्बुलेंट सिस्टम विश्राम की स्थिर, और मजबूत स्थिति कैसे प्राप्त करती है। इस शोध को फिज़िकल रिव्यू ई (लेटर्स) पत्रिका में “यूनवर्सल टर्बुलेंट रीलैक्सैशन ऑफ फ्लूड्स एण्ड प्लास्मा बाइ द प्रिन्सपल ऑफ वैनिशिंग नॉनलाइनियर ट्रांसफर” अध्ययन के रूप में प्रकाशित किया गया है। शोध टीम में आईआईटी कानपुर के भौतिकी विभाग के प्रो. सुप्रतीक बनर्जी और शोधकर्ता अरिजीत हलदर और नंदिता पान, शामिल हैं।

प्रोफ. सुप्रतीक बनर्जी कहते है, इस अवधारणा को स्पष्ट करने के लिए, शोधकर्ता एक कप कॉफी में दूध मिलाने के उदाहरण का उपयोग करते हैं। “जब हम कॉफी को मिक्स करते हैं, तो हम भंवर और टर्ब्युलन्स पैदा करते हैं जिससे दूध जल्दी से मिल जाता है। हालांकि, जब हम मिक्स करना बंद कर देते हैं, तो अंत में प्रवाह बंद होने से पहले सिस्टम “टर्बुलेंट रीलैक्सैशन” के माध्यम से खुद को व्यवस्थित करता है। पीवीएनएलटी के अनुसार, यह तब होता है जब सिस्टम टर्बुलेंट कैस्केड को समाप्त करके अपने गैर-रैखिक स्थानांतरण से छुटकारा पाता है । इस अवस्था में, स्थिरता का पता लगाया जाता है क्योंकि एक पैमाने पर निर्भर एन्ट्रापी फ़ंक्शन को अधिकतम किया जाता है, जब द्रव के विभिन्न भागों के बीच सहसंबंध गायब हो जाता है” ।

पीवीएनएलटी सिद्धांत को दो और तीन आयामी तरल पदार्थ और प्लास्मा दोनों के लिए सही दबाव-संतुलित आराम देने वाले अवस्था को दिखाया गया है, जैसा कि पहले संख्यात्मक सिमुलेशन में प्राप्त किया गया था। इसका मतलब यह है कि वर्तमान सिद्धांत सही ढंग से भविष्यवाणी कर सकता है कि वास्तविकता में टर्बुलेंट रीलैक्सैशन कैसे होता है। यह तकनीक मौलिक है और आसानी से जटिल तरल पदार्थों पर लागू की जा सकती है, जिसमें संपीड़ित तरल पदार्थ, प्लास्मा, बाइनरी तरल पदार्थ आदि शामिल हैं।

“ग़ैर-रैखिक स्थानांतरण के सिद्धांत के माध्यम से, हम समझने के लिए एक सार्वभौमिक तंत्र को उजागर करने में सक्षम हुए हैं कि टर्बुलेंट सिस्टम एक आराम से और स्थिर स्थिति तक कैसे पहुंचती है। हमारे शोध में न केवल तरल पदार्थों के अध्ययन के लिए बल्कि प्लास्मा और अन्य जटिल तरल पदार्थों के लिए भी महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। प्रोफ. बनर्जी कहते हैं, “हम इस सिद्धांत के भविष्य के अनुप्रयोगों के लिए व्यापक क्षेत्रों में संभावना के बारे में उत्साहित हैं।”

ब्रह्माण्ड संबंधी प्लास्मा की हमारी समझ के लिए इस शोध के महत्वपूर्ण निहितार्थ हैं। कॉस्मोलॉजिकल प्लास्मा ऐसे प्लास्मा हैं जो बाहरी अंतरिक्ष में मौजूद होते हैं, जैसे कि स्टेलर एनवेलपस, गैसीय नीहारिका और इंटरस्टेलर स्पेस। प्लाज़्मा पदार्थ की एक अवस्था है जिसमें आवेशित कण होते हैं, जैसे आयन और इलेक्ट्रॉन जो विद्युत चुम्बकीय क्षेत्रों के साथ परस्पर क्रिया करते हैं। ये प्लाज़मा अक्सर तरलमिश्रित होते हैं, जिसका अर्थ है कि वे बहुत घने नहीं हैं, लेकिन फिर भी वे महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे ब्रह्मांड को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

इन ब्रह्माण्ड संबंधी प्लास्माओं की दिलचस्प विशेषताओं में से एक यह है कि वे अक्सर “बल-मुक्त” चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं और विद्युतीय क्षेत्र के बीच एक स्पष्ट संरेखण नियमित पैटर्न प्रदर्शित करते हैं । यह संरेखण, लोकप्रिय रूप से बेल्ट्रामी-टेलर संरेखण कहा जाता है, यह महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बाह्य अंतरिक्ष में इन प्लाज़्मा के व्यवहार को समझाने में मदद करता है। उदाहरण के लिए, यह व्याख्या कर सकता है कि प्रकाश के कुछ तरंग दैर्ध्य में अंतरिक्ष के कुछ क्षेत्र दूसरों की तुलना में उज्जवल क्यों दिखाई देते हैं।

हालाँकि, अब तक, एक शिथिल अवस्था प्राप्त करने वाले प्लाज़्मा का तंत्र लंबे समय से चली आ रही बहस का विषय रहा है। पीवीएनएलटी पर शोध का ब्रह्माण्ड संबंधी प्लास्मा की हमारी समझ के लिए महत्वपूर्ण निहितार्थ है क्योंकि यह इस बारे में सोचने का एक नया तरीका प्रदान करता है कि कैसे टर्बुलेंट सिस्टम, जैसे कि प्लास्मा, एक स्थिर, आराम की स्थिति तक पहुँचती है। यह समझकर कि ये प्रणालियाँ कैसे आराम करती हैं, हम उनके व्यवहार और उनके द्वारा प्रदर्शित पैटर्न को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं।

पीवीएनएलटी सिद्धांत यह समझने के लिए एक एकीकृत ढांचा प्रदान करता है कि टर्बुलेंट सिस्टम कैसे एक कप कॉफी से लेकर ब्रह्माण्ड संबंधी प्लास्मा तक एक स्थिर, आराम की स्थिति तक पहुंचती हैं। अनुसंधान में प्रयोगशाला और खगोलभौतिकीय प्लास्मा दोनों में अध्ययन और खोज के नए रास्ते खोलने की क्षमता है।

आईआईटी कानपुर के बारे में

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) कानपुर की स्थापना 2 नवंबर 1959 को संसद के एक अधिनियम द्वारा की गई थी। संस्थान का विशाल परिसर 1055 एकड़ में फैला हुआ है, जिसमें 19 विभागों, 22 केंद्रों, इंजीनियरिंग, विज्ञान, डिजाइन, मानविकी और प्रबंधन विषयों में 3 अंतःविषय कार्यक्रमों में फैले शैक्षणिक और अनुसंधान संसाधनों के बड़े पूल के साथ 540 पूर्णकालिक संकाय सदस्य और लगभग 9000 छात्र हैं । औपचारिक स्नातक और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों के अलावा, संस्थान उद्योग और सरकार दोनों के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अनुसंधान और विकास में सक्रिय रहता है।
अधिक जानकारी के लिए https://iitk.ac.in पर विजिट करें।

रिपोर्ट – अवनीश

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